प्लासी का युद्ध कब और किसके बीच हुआ था? Plasi ka Yuddh in Hindi

प्लासी का युद्ध कब हुआ था | Plasi ka yuddh kab hua tha | प्लासी के युद्ध के समय बंगाल का नवाब कौन था | प्लासी का युद्ध कब हुआ था किसके बीच | प्लासी का युद्ध किसके बीच हुआ था

प्लासी का युद्ध ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए सबसे निर्णायक साबित हुआ था, क्योंकि इस युद्ध के बाद ही ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपना प्रसार काफी तेजी से शुरू कर दिया था और कुछ ही सालों में पूरे भारत में अपना कब्जा जमा लिया था।

हालांकि इस युद्ध को लेकर बंगाल के नवाब पहले से ही आशंकित थे, लेकिन इस युद्ध में नवाब के दरबार के कुछ लोगों ने ही ईस्ट इंडिया कंपनी की मदद की जो युद्ध में उनके हार का कारण बनी। इस युद्ध के बाद से ही पूरे बंगाल पर ईस्ट इंडिया कंपनी का कब्जा हो गया और धीरे-धीरे उन्होंने पूरे भारत पर अधिकार कर लिया। इस आर्टिकल में हम आपको प्लासी का युद्ध क्यों हुआ? और प्लासी का युद्ध के बारे में विस्तार से जानकारी देने जा रहे हैं।

प्लासी का युद्ध क्यों हुआ?

जैसा कि हमने आपको ऊपर ही बताया कि प्लासी का युद्ध ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में प्रसार के लिए सबसे निर्णायक माना जाता है। इस युद्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को जीत हासिल हुई थी और इस तरह से बंगाल पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया था। प्लासी का युद्ध तत्कालीन बंगाल के प्लास्टिक छेत्र में भागीरथी नदी के पूरब की ओर लड़ी गई थी। 1757 में हुए इस युद्ध में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की ओर से रॉबर्ट क्लाइव आमने सामने थे। युद्ध में कुछ फ्रांसीसियों ने भी सिराजुद्दौला का साथ दिया था।

इस युद्ध के बारे में बात करने से पहले इसके पीछे की कहानी जानना बहुत ही आवश्यक है। सिराजुद्दौला से पहले बंगाल के नवाब अली वर्दी खान था, जो पहले बिहार का उपराज्यपाल हुआ करता था। बंगाल के दीवान मुर्शिद कुली खान के पुत्र सरफराज खान की हत्या करके वह बंगाल का नवाब बना था। अली वर्दी खान की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला उसके उत्तराधिकारी के रूप में बंगाल का नवाब बना। हालांकि सिराजुद्दौला के दरबार में उसके कई सारे विरोधी हुआ करते थे जिन्होंने बाद में प्लासी में लड़े गए युद्ध अंग्रेजों की मदद भी की।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी धीरे-धीरे भारत में अपना प्रचार करती जा रही थी। प्लासी के युद्ध से पहले उन्होंने कर्नाटक में भी विजय प्राप्त करके उसे अपने कब्जे में ले लिया था। कर्नाटक में ईस्ट इंडिया कंपनी की जीत को देखते हुए सिराजुद्दौला को पहले से ही अलग गया था कि बंगाल में भी जल्द ही युद्ध होने वाला है। उस समय कंपनी के अधिकारियों को व्यापार करने के लिए कई सारे विशेषाधिकार दिए गए थे जिसका उन्होंने बहुत ही अधिक दुरुपयोग किया था।

इस दुरुपयोग के चलते बंगाल के नवाब के वित्त पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा था और उसे इसका काफी नुकसान भी हो रहा था। इसके ठीक बाद अंग्रेजों ने बिना बंगाल के नवाब से अनुमति लिए ही कोलकाता की किलेबंदी कर दी। अब सिराजुद्दौला पूरी तरह से यह समझ चुका था कि अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध करना निश्चित है।

कोलकाता की किलेबंदी से  क्रोधित होकर सिराजुद्दौला ने कोलकाता जाकर 1756 में फोर्ट विलियम को हराकर उसे आत्मसमर्पण पर मजबूर कर दिया। हालांकि सिराजुद्दौला ने ईस्ट इंडिया कंपनी को सबक सिखाने की ठान ली थी और उन्हें किसी भी हाल में बंगाल से दूर रहने के लिए मजबूर करने की सोच ली थी। इसीलिए उसने 20 जून 1756 को कोलकाता में ही एक छोटी सी काल-कोठरी में 146 ब्रिटिश सैनिकों को कैद कर दिया। दम घुटने के चलते 123 कैदियों की मौत हो गई। इतिहास में इस घटना को ‘कलकत्ता के ब्लैक होल’ के नाम से जाना जाता है।

सिराजुद्दौला के इस कृत्य के चलते अंग्रेज और भी अधिक भड़क गए और उन्होंने उसके खिलाफ युद्ध करने की और उसे जान से मारने की ठान ली। अंग्रेजों को बंगाल में बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा था जिसके बाद रॉबर्ट क्लाइव को सिराजुद्दौला के खिलाफ युद्ध करने और बंगाल में कब्जा जमाने के लिए बुलाया गया। उस समय रॉबर्ट क्लाइव मद्रास में रहा करता था।

रॉबर्ट क्लाइव एक कुशल रणनीतिकार और एक कुशल योद्धा माना जाता था। बंगाल आते ही उसने सबसे पहले नवाब सिराजुद्दौला से असंतुष्ट लोगों को अपने साथ मिलाना शुरू कर दिया। इसके लिए वह कोई भी कीमत देने को तैयार हो गया था। इस क्रम में उसने मीर जाफर और नवाब के अन्य करीबियों को रिश्वत देकर अपने साथ मिला लिया।

मीर जाफर उस समय नवाब सिराजुद्दौला का रिश्तेदार और बहुत ही करीबी हुआ करता था जिसे किसी भी तरह से बंगाल के नवाब की गद्दी हासिल करनी थी। इसी उद्देश्य से मीर जाफर ने अंग्रेजों से समर्थन के बदले नवाब की गद्दी मांगी और इसके लिए उसने गुप्त संधि कर ली।

प्लासी का युद्ध (Plasi Ka Yuddh):

इसके बाद जब रॉबर्ट क्लाइव को यह लगा कि उसकी स्थिति मजबूत हो गई है तब उसने नवाब के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया। प्लासी में नवाब सिराजुद्दौला और रॉबर्ट क्लाइव की सेना एक दूसरे के खिलाफ युद्ध मैदान में आ गई। इस युद्ध में नवाब का साथ उसके कुछ फ्रांसीसी सहयोगी दे रहे थे और उन्होंने नवाब की मदद के लिए अपनी सेना भी साथ भेजी थी।

1757 में हुए प्लासी के इस युद्ध में नवाब सिराजुद्दौला की ओर से 50000 सैनिक और रॉबर्ट क्लाइव की ओर से 3000 सैनिक युद्ध के लिए आमने-सामने थे। लेकिन रॉबर्ट क्लाइव का मुख्य उद्देश्य किसी भी हाल में नवाब सिराजुद्दौला की मृत्यु और बंगाल पर कब्जा करना था। नवाब के जिन करीबियों को सिराजुद्दौला ने अपने साथ मिला लिया था उन्होंने रॉबर्ट क्लाइव की काफी मदद की और उसकी स्थिति को मजबूत कर दिया।

अंग्रेजों से मिले होने के कारण मीरजाफर ने एक तिहाई बंगाली सेना को इस लड़ाई में शामिल नहीं होने दिया जिसके चलते नवाब सिराजुद्दौला की हार हो गई। लड़ाई में हार की स्थिति को देखते हुए सिराजुद्दोला ने युद्ध स्थल से भागने की कोशिश की लेकिन मीर जाफर के बेटे मीर ज़ाफर के बेटे मीरन उसकी हत्या कर दी। प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों को विजय मिली।

इसके बाद मीर जाफर के समर्थन के बदले उसे बंगाल का नवाब घोषित करके मुर्शिदाबाद की गद्दी पर बैठा दिया गया। हालांकि जब मीर जाफर और रॉबर्ट क्लाइव के बीच गुप्त संधि हुई थी तो उसने बंगाल के 24 परगना की जमीदारी देने का समझौता किया था। अपने समझौते के अनुसार उसने अंग्रेजों को संतुष्ट करने के लिए यह काम कर दिया।

हालांकि अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा दिन प्रतिदिन काफी बढ़ती जा रही थी और वह किसी भी हाल में बंगाल के सभी क्षेत्रों में अपना पूरी तरह से कब्जा जमाना चाहते थे। मीर जाफर अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा को पूरी तरह से संतुष्ट करने में नाकामयाब रहा जिसके बाद उसे सिंहासन से हटा दिया गया और उसके दामाद मीर कासिम को गद्दी पर बैठा दिया गया। इसके बाद मीर कासिम सिर्फ अंग्रेजों की कठपुतली बनकर रह गया।

अंग्रेज बंगाल में अपनी शासन सत्ता पूरी तरह से जमा चुके थे और अपने मनमर्जी के अनुसार कोई भी कार्य किया करते थे। प्लासी का युद्ध अंग्रेजों के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ था क्योंकि इसके बाद अंग्रेजों ने बंगाल में अपनी राजनीतिक और सैन्य शक्ति पूरी तरह से स्थापित कर ली थी। उसमें बंगाल पूरे भारत का एक महत्वपूर्ण राज्य हुआ करता था। अब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में एक और जमीन मिल गई थी जहां से वह पूरे भारत पर अपना कब्जा जमाने के बारे में आसानी से सोच सकता था।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न और उनके उत्तर (FAQ)

ऊपर हमने आपको प्लासी के युद्ध के बारे में सभी चीजें बड़े ही विस्तार से समझा दी हैं। उम्मीद है कि आपको इसे पढ़ने के बाद सभी प्रकार की जानकारी मिल गई होगी। हालांकि कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रतियोगियों से कुछ सवाल पूछे जाते हैं जिसका उत्तर देना बहुत ही आवश्यक है। नीचे हम आपको प्लासी के युद्ध से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न और उनके उत्तर बताने जा रहे हैं।

प्लासी का युद्ध कब हुआ था? (Plasi Ka Yuddh Kab Hua Tha?)

प्लासी का युद्ध 1757 में बंगाल के प्लासी क्षेत्र में भागीरथी नदी के पूर्व की ओर हुआ था। इस युद्ध में रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना ने विजय प्राप्त की थी।

प्लासी का युद्ध किसके बीच हुआ था?

प्लासी का युद्ध बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी रॉबर्ट क्लाइव के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध में सिराजुद्दौला के करीबी मीरजाफर ने नवाब को धोखा देते हुए अंग्रेजों का साथ दिया था। मीर जाफर के पुत्र मीरन ने ही नवाब सिराजुद्दौला की युद्ध स्थल से भागते समय हत्या की थी।

प्लासी के युद्ध के समय बंगाल का नवाब कौन था?

प्लासी के युद्ध के समय बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला था, जिसने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व वाली अंग्रेजों की सेना से युद्ध लड़ा। हालांकि यदि इस युद्ध में उसे अपने करीबियों द्वारा धोखा ना मिलता तो शायद वह अंग्रेजों को इस युद्ध में हरा सकता था। लेकिन उसके रिश्तेदार मीर जाफर ने एक तिहाई सेना को उसकी मदद के लिए नहीं भेजी और उसके बेटे मीरन ने बंगाल के नवाब की हत्या भी कर दी।

प्लासी के युद्ध में अंग्रेजो को विजय मिलने के बाद शर्त के अनुसार मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया। हालांकि जब मीर जाफर अंग्रेजों की महत्वाकांक्षाओं को संतुष्ट करने में कामयाब नहीं हुआ तो उसे पद से हटाकर उसके दामाद मीर कासिम को गद्दी पर बैठा दिया गया।

 

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