निजीकरण क्या है इसके गुण दोष की विवेचना कीजिए

निजीकरण क्या है इसके गुण दोष की विवेचना कीजिए | भारत में निजीकरण की शुरुआत कब हुई | Nijikaran kya hota hai | निजीकरण का अर्थ क्या है | निजीकरण की विशेषताएं | निजीकरण से नुकसान | निजीकरण से लाभ

वर्तमान समय में भारत में निजीकरण की चर्चा काफी जोरों पर है। बहुत सारे लोग निजीकरण को लेकर काफी विरोध भी करते हैं तो कुछ लोगों को देश के विकास में निजीकरण को एक बहुत ही अहम कदम मानते हैं। हालांकि दुनिया में ऐसे बहुत सारे देश हैं जहां पर निजीकरण के नीति को अपनाया जाता है और सबसे बड़ी बात यह है कि वह सभी विकसित देश ही हैं।

हालांकि निजीकरण में भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आते हैं लेकिन यदि सरकारें अच्छी तरह से काम करें तो इसे भी बड़े ही आसानी से रोका जा सकता है। यदि आप निजीकरण के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो यह आर्टिकल आपके बहुत ही काम आ सकता है क्योंकि इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि निजीकरण क्या है? इसके लाभ और हानि की विवेचना कीजिए, भारत में निजीकरण की शुरुआत कब हुई?

निजीकरण क्या है / Nijikaran kya hota hai / निजीकरण का अर्थ क्या है?

निजीकरण को अंग्रेजी भाषा में Privatization कहा जाता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट समझ में आ रहा है कि इसमें किसी भी संस्था या उद्योग को निजी यानी प्राइवेट किया जाता है। लेकिन यह समझना बहुत ही जरूरी है कि निजीकरण क्या है? क्योंकि आपके मन में यह बात आ रही होगी कि किसी भी निजी उद्योग को या निजी उद्योग शुरू करने को निजीकरण कहा जाता है, तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। दरअसल, किसी भी सरकारी उद्योग, कार्य या किसी सरकारी संस्था को किसी निजी संस्था या निजी व्यक्ति के हाथों में सौंपना निजीकरण कहलाता है।

जैसे सरकार यदि किसी उद्योग या संस्था के विकास के लिए या उसके बेहतर संचालन के लिए उसे किसी निजी कंपनी के हाथों में सौंप देती है। उदाहरण के लिए आज के समय में भारत में बहुत सारे रेलवे स्टेशन की देखरेख और संचालन के लिए निजी कंपनियों को जिम्मेदारी सौंप दी गई है। इस कार्य को लेकर सरकार का बहुत अधिक विरोध भी होता रहा है क्योंकि लोग यह मानते हैं कि निजीकरण करने से सरकारी नौकरियों में कमी आती है। हालांकि देश के विकास में निजीकरण का बहुत ही बड़ा योगदान होता है।

क्योंकि यदि सरकार सभी क्षेत्रों में काम करने लगे तो लोगों का सरकारी संस्थाओं पर सबसे अधिक भरोसा होता है और ऐसी स्थिति में निजी क्षेत्र की कंपनियों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है। इसके विपरीत निजी कंपनियों में सरकारी कंपनियों के मुकाबले ग्राहकों को अच्छी सुविधाएं दी जाती है। उदाहरण के रूप में यदि प्राइवेट बैंकों की बात की जाए तो यहां पर सरकारी बैंकों से अच्छी सुविधाएं मिलती हैं। इसीलिए बहुत सारे लोग निजी क्षेत्र की कंपनियों की सुविधाएं लेना पसंद करते हैं।

यदि टेलीकॉम सेक्टर में बात करें तो भारत में बीएसएनल एमटीएनएल इत्यादि की हालत कितनी अधिक खराब है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब जिओ एयरटेल वोडाफोन जैसी कंपनियों ने 4G सर्विस शुरू कर दी थी तो बीएसएनल सरकारी कंपनी होते हुए भी 4G की सुविधा नहीं लांच कर सकी। आज के समय में बहुत सारे लोग बीएसएनल के सिम का इस्तेमाल बहुत ही कम करते हैं, जबकि जिओ एयरटेल और वोडाफोन के यूजर्स की संख्या काफी अधिक है।

निजीकरण के गुण दोष की विवेचना कीजिए:

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि निजीकरण से देश को कई प्रकार से आर्थिक लाभ होता है तो वहीं इसके कई हानि भी हैं। नीचे हम निजीकरण के लाभ एवं हानि की विवेचना करने जा रहे हैं।

निजीकरण के लाभ:

  1. प्रदर्शन में सुधार होता है:

आप इस बात को बखूबी समझते होंगे कि जब सरकार द्वारा कोई उद्योग या संस्था संचालित होता है तो उसमें राजनीतिक हस्तक्षेप अधिक होता है। इसके साथ ही साथ हर उद्योग में प्रशासन का भी काफी हस्तक्षेप होता है जिसके चलते उसके विकास में रुकावट आती है। इसके साथ ही साथ किसी सरकारी उद्योग या संस्था में काम करने वाले कर्मचारी यहां पर मिलने वाली सुविधाओं से इतने खुश होते हैं कि वह अच्छी तरह से काम नहीं करते हैं जिसके चलते संस्था का प्रदर्शन लगातार गिरते जाता है। इसके विपरीत निजी क्षेत्र के संस्थाओं या उद्योगों का प्रदर्शन लगातार ऊपर उठते जाता है।

बैंकों या टेलीकॉम सेक्टर या अन्य किसी उद्योग क्षेत्रों में तुलना करके आप सरकारी और निजी क्षेत्रों में मिलने वाली सुविधाओं का आकलन कर सकते हैं। इसके साथ ही साथ, उद्योग में निजी क्षेत्र का योगदान लगातार बढ़ता जाता है, जबकि कई सरकारी उद्योगों की हालत लगातार खराब होती जाती है। निजी क्षेत्र में ग्राहकों को अच्छी खासी सुविधाएं भी दी जाती हैं, क्योंकि ये ग्राहक संतुष्टि को ध्यान में रखते हुए किसी भी हाल में अपने उद्योग को बेहतर स्थिति में और मुनाफे में ले जाने के लिए कठिन प्रयास करती हैं। इसके विपरीत सरकारी क्षेत्र की कंपनियों या उद्योगों में काम करने वाले लोगों का लक्ष्य किसी तरह से काम करके वेतन प्राप्त करना होता है।

  1. उत्पादकता (Productivity) में भी सुधार होता है:

हालांकि सरकार के पास लोगों की कमी नहीं होती है लेकिन उन्हें किसी भी संसाधन का सीमित ढंग से उपयोग करना होता है। क्योंकि सरकार का ध्यान समाज के सभी क्षेत्रों का पोषण करने पर होता है। सार्वजनिक क्षेत्रों में अक्सर उत्पादकता में कमी आती है क्योंकि उनके पास जरूरी संसाधनों की कमी होती है। इसके अलावा निजी क्षेत्रों का उद्देश्य जरूरी साधनों का उचित प्रयोग करके प्रोडक्टिविटी यानी उत्पादकता बढ़ाने पर होता है। इसीलिए आपने देखा होगा कि सार्वजनिक क्षेत्रों के मुकाबले निजी क्षेत्र के कंपनियों की उत्पादकता बेहतर होती है।

  1. गुणवत्ता मे सुधार आता है:

सार्वजनिक क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा की कमी होती है जिसके चलते उनके उत्पादों की गुणवत्ता में कमी दिखाई देती है। इसके साथ ही साथ सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में काम करने वाले लोगों में प्रतिस्पर्धी सोच की कमी होती है क्योंकि उन्हें एक निर्धारित वेतन लगातार मिलते रहता है और एक निश्चित समय बाद ही उनका कार्यकाल समाप्त होता है। इसके विपरीत निजी क्षेत्र की कंपनियों में बेहतर प्रबंधन क्षमता होती है और किसी भी काम करने का टारगेट बनाया जाता है। इतना ही नहीं यदि आप निजी क्षेत्र की कंपनी में बेहतर तरीके से काम नहीं करते हैं तो आपको बाहर भी कर दिया जाता है इसीलिए हर कर्मचारी के अंदर अच्छा काम करने की मजबूरी होती है।

निजी क्षेत्रों में अधिक प्रतिस्पर्धा होती है और हर कंपनी को अपने प्रतिस्पर्धी कंपनी से बेहतर प्रदर्शन करना होता है। इसीलिए आपको निजी क्षेत्र की कंपनियों के उत्पादों में गुणवत्ता दिखाई देती है और लगातार उसमें सुधार भी होती रहती है। इतना ही नहीं निजी क्षेत्र की कंपनियां समाज और ट्रेंड के साथ चलकर अपने कारोबार को बेहतर बनाती हैं।

  1. मैनेजमेंट बेहतर रहता है:

किसी भी कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए बेहतर मैनेजमेंट होना बहुत ही जरूरी होता है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में मैनेजमेंट की कमी होती है क्योंकि उसमें काम करने वाले सभी लोगों की एक निश्चित सैलरी निर्धारित की गई होती है। यदि वे अच्छी तरह से काम नहीं करते हैं तो भी उनको सैलरी मिलती रहती है। जिसके चलते हुए लगन से काम करने पर कम ध्यान देते हैं। इसके विपरीत निजी क्षेत्र की कंपनियों में मैनेजमेंट काफी अच्छी तरह से होता है और हर व्यक्ति की अपनी उच्च अधिकारियों के प्रति जवाबदेही होती है।

निजी क्षेत्र की कंपनियों में सबसे अच्छी बात यह है कि यहां पर काम करने वाले लोगों को एक टारगेट दिया जाता है और उस टारगेट को पूरा करने का दबाव काफी अधिक होता है। इसीलिए यहां काम करने वाले लोगों के मन में किसी भी हाल में कंपनी द्वारा निर्धारित किए गए टारगेट को पूरा करना होता है और यदि वे टारगेट को पूरा नहीं कर पाते हैं तो अधिकारियों द्वारा काफी कुछ सुनना भी पड़ता है। टारगेट पूरा करने से उनके मुनाफे में भी वृद्धि होती है। इसीलिए किसी भी कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए बेहतर मैनेजमेंट होना जरूरी है, निजी क्षेत्र में यह काफी अच्छी तरह से प्रभावी है।

  1. लगातार निवेश होता रहता है:

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में निवेश की काफी कमी होती है क्योंकि सरकार अपनी कंपनियों पर उतना अधिक ध्यान नहीं देती है। इसके विपरीत निजी क्षेत्र की कंपनियां अपने उद्योग में लगातार निवेश करते रहती हैं और उसे मांग के अनुसार बेहतर बनाने का प्रयास करती रहती हैं। यदि कोई निजी क्षेत्र की कंपनी भविष्य में बेहतर प्रदर्शन कर सकती है तो बहुत सारे बड़े बड़े निवेशक उसमें अपना निवेश करते हैं और उद्योग को आगे बढ़ाने का काम करते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में इसकी कमी पाई जाती है जिसके चलते उसका विकास नहीं हो पाता है।

  1. राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं रहता है:

सार्वजनिक क्षेत्रों में सरकार के साथ-साथ राजनीतिक हस्तक्षेप भी होता है जिसके चलते कंपनियां अच्छी तरह से काम नहीं कर पाती हैं। इसके विपरीत निजी क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं रहता है और ना ही सरकार उसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करना चाहती है। यदि कोई निजी क्षेत्र की कंपनी बनाए गए नियमों के अनुसार अच्छी तरह से काम करती है तो सरकार का उसमें हस्तक्षेप नहीं होता है। इसके अलावा निजी क्षेत्र की कंपनियां बाजार की मांग के अनुसार उत्पादन करती हैं और उसकी पूर्ति करने का प्रयास करती हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में बाजार की मांग पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है।

  1. भ्रष्टाचार में कमी आती है:

यदि किसी कंपनी में राजनीतिक हस्तक्षेप ना हो तो उसमें भ्रष्टाचार की कमी होती है। अफसरशाही के चलते सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में भ्रष्टाचार काफी अधिक दिखाई देता है। लेकिन निजी क्षेत्र की कंपनियों में भ्रष्टाचार की कमी होती है क्योंकि यहां पर कर्मचारियों और अधिकारियों की जवाबदेही तय होती है। भ्रष्टाचार में कमी होने से कंपनियों को काफी लाभ होता है।

निजीकरण के नुकसान:

हालांकि निजीकरण से बहुत सारे लाभ हैं, लेकिन इनसे कुछ नुकसान भी होते हैं। नीचे हम आपको निजीकरण के नुकसान बताने जा रहे हैं।

  1. जनता के प्रति जवाबदेही नहीं होती:

निजी क्षेत्र की कंपनियों का जनता के प्रति कोई जवाबदेही नहीं होती है। वे अपने उत्पादों या सेवाओं को मनमाना दाम पर बेच सकते हैं जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि सरकार का जनता के प्रति जवाबदेही होती है।

  1. जनता के हित का कम ध्यान:

सरकार का उद्देश्य समाज के हितों के लिए काम करना होता है जबकि निजी क्षेत्र का उद्देश्य पैसे कमाना होता है।

  1. सरकारी नौकरियों और आर्थिक समानता में कमी:

समाज में आर्थिक समानता को बरकरार रखना सरकार का दायित्व होता है। इसीलिए सार्वजनिक क्षेत्रों में लोगों को नौकरी दी जाती है और एक रैंक के लोगों को समान वेतन दिया जाता है। इसके विपरीत निजीकरण के चलते देश की अर्थव्यवस्था पर उद्योग पतियों का दबदबा बढ़ने लगता है। इसके साथ ही साथ सरकारी नौकरियों और आर्थिक समानता में कमी आती है।

  1. पूंजीवाद को बढ़ावा मिलता है:

भले ही निजीकरण के चलते देश की अर्थव्यवस्था में सुधार होता हो लेकिन अपनी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए सरकार निजी क्षेत्रों के पक्ष में नीतियां निर्धारित करने लगती हैं जिसके चलते पूंजीवाद को बढ़ावा मिलता है।

  1. स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में कमी:

आपने देखा होगा कि देश की सरकार बड़े पूंजीपतियों के अनुसार कई आर्थिक नीतियां बनाती है। इसके लिए वह बड़े पूंजीपतियों को लोन भी उपलब्ध कराती हैं। इसके चलते स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में कमी आती है और छोटे उद्योग करने वाले लोग पीछे रह जाते हैं।

भारत में निजीकरण की शुरुआत कब हुई?

1991 की नई आर्थिक नीति के अंतर्गत भारत में निजीकरण को भी शामिल किया गया। 1991-92 की आर्थिक मंदी के दौरान भारत में वैश्वीकरण और उदारीकरण को भी अपनाया गया। हालांकि 1980 के दशक में ही कई सारे बड़े देश भारत को वैश्वीकरण और निजीकरण के लिए दबाव बना रहे थे, लेकिन भारत इसके लिए राजी नहीं हुआ था।

1991 की नई आर्थिक नीति में जब मिश्रित अर्थव्यवस्था की अवधारणा को शामिल किया गया तो इसमें सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों को तरजीह दी गई। सरकार ने विनिवेश द्वारा 2500 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था और 3040 करोड़ अधिक जुटा पाने में सफल रही थी।

इसके साथ ही साथ वैश्वीकरण की नीति भी अपनाई गई ताकि विश्व का कोई भी देश भारत में आकर व्यापार कर सके और अपना उद्योग लगा सके। इसके लिए उदारीकरण की नीति भी अपनाई गई ताकि उन्हें लाइसेंस लेने में अधिक समस्या का सामना ना करना पड़े। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सरकार अपने बजट में हर साल विनिवेश का लक्ष्य निर्धारित करती है और उसे पूरा करने का प्रयास भी करती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

इस आर्टिकल में हमने आपको निजीकरण क्या है? इसके लाभ एवं हानि की विवेचना कीजिए, भारत में निजीकरण की शुरुआत कब हुई? के बारे में विस्तार से जानकारी दी है यदि आपको यह आजकल पसंद आया हो तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करें। इसी तरह से आजकल पढ़ने के लिए हमारे वेबसाइट को बुकमार्क अवश्य करें।

 

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