Loktantra Kya Hai? लोकतंत्र की परिभाषा | लोकतंत्र की विशेषताएं

Loktantra Kya Hai?: आपने अक्सर चुनावों के दौरान नेताओं को लोकतंत्र की बात करते सुनी होगी। बहुत सारे लोग इस शब्द का मतलब अच्छी तरह से समझते हैं लेकिन कई युवाओं को यह जानकारी नहीं होती है कि लोकतंत्र क्या है? ऐसे लोगों के लिए यह आर्टिकल बहुत ही काम आ सकता है क्योंकि यहां पर हम आपको लोकतंत्र के बारे में विस्तार से बताने के साथ ही साथ लोकतंत्र की परिभाषाएँ और इसकी अवधारणाएँ भी बताएंगे।

आप सभी को यह मालूम होगा 1947 यानी आजादी से पहले भारत में राजशाही तंत्र हुआ करता था। उस समय भारत की जनता के पास मत देकर अपना मनपसंद शासक चुनने का अधिकार नहीं था। लेकिन आजादी के बाद भारत में संविधान का निर्माण हुआ और यह देश लोकतांत्रिक बन गया। अब यहां पर हर 5 साल में चुनाव होता है, जिसमें जनता अपनी स्वेच्छा अनुसार मतदान कर सकती हैं।

लोकतंत्र क्या है (Loktantra Kya Hai)? / Loktantra Kise Kahate Hain?

लोकतंत्र को प्रजातंत्र भी कहा जाता है। लोकतंत्र शब्द ‘लोक’ और ‘तंत्र’ शब्द से मिलकर बना है, जिसमें लोक शब्द का अर्थ है ‘जनता’ और तंत्र का अर्थ है ‘शासन’। इस प्रणाली में जनता को मत देने का अधिकार मिलता है। इसका मतलब क्या है कि देश या राज्य के लोग निर्वाचन में आए हुए किसी भी उम्मीदवार को वोट देकर उसे अपना नेता चुन सकते हैं।

इसके अलावा, यदि वह नेता उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता है तो वह अगले चुनाव में किसी दूसरे उम्मीदवार को वोट देकर उसे सत्ता से बाहर भी कर सकते हैं। किसी भी लोकतांत्रिक देश में जनता को मिला यह अधिकार सप्ताह को गलत काम करने से रोकने और उनमें जनता का डर बनाने में मदद करता है।

किसी भी देश में उसी व्यक्ति के हाथ में सत्ता होनी चाहिए जो जनता के लिए काम करें और उनके कल्याण के बारे में सोचें। तभी एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना हो सकती है जिसमें सभी लोग खुशहाल रहेंगे। जनता को मिला वोट देने का अधिकार इस उद्देश्य की पूर्ति करने में मदद करता है।

अक्सर, लोकतंत्र शब्द का प्रयोग राजनीतिक क्षेत्र में अधिक होता है लेकिन यह अलग-अलग संगठनों और समूहों पर भी प्रभावी होता है। उदाहरण के रूप में, यदि कोई ऐसा संगठन है जिसमें अध्यक्ष और महासचिव को मतदान के जरिए चुना जाना है, तो उस प्रणाली को भी लोकतंत्र ही कहा जाता है। क्योंकि वहां पर कोई भी व्यक्ति मनमाने ढंग से सत्ता हासिल नहीं करता है।

लोकतंत्र को भली-भांति समझने के लिए आपको राजशाही तंत्र के बारे में भी समझना बहुत ही आवश्यक है। राजशाही तंत्र में जनता को अपने अनुसार किसी भी व्यक्ति को सत्ता देने का अधिकार नहीं होता है, जबकि लोकतंत्र में ऐसा है। हालांकि दोनों ही प्रणाली में सत्ता पर आसीन व्यक्ति ही सारे फैसले लेता है और उसमें जनता से राय नहीं ली जाती है।

हालांकि, आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि स्विट्जरलैंड दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जहां पर कोई भी विधेयक या कानून लागू करने से पहले जनता की भी राय ली जाती है और वोटिंग के जरिए इसका फैसला होता है। इसके अलावा अन्य किसी भी देश में जनता को यह अधिकार नहीं मिलता है।

इसीलिए कई समाजशास्त्री भी मानते हैं कि लोकतंत्र एक ऐसा छलावा है, जिसमें जनता को यह लगता है कि सारी शक्तियां उसके पास है, जबकि यह कुछ व्यक्तियों के पास ही रहती है। क्योंकि इस प्रणाली में जनता सिर्फ वोट ही डाल सकती है, जबकि सत्ता पर बैठा व्यक्ति चाहे तो मनमानी ढंग से फैसले ले सकता है और उसमें जनता विरोध के सिवा और कुछ भी नहीं कर सकती है।

हालांकि, राजनीतिक संदर्भ में कई सारी पार्टियां और अलग अलग विचारधारा वाले लोग हिस्सा लेते हैं। जब कोई भी विधेयक या कानून लागू करने की बात कही जाती है तो सत्ता पर बैठे विचारधारा की खिलाफत करने वाले लोग उसका विरोध जरूर करते हैं। ऐसे में उस विधेयक या कानून का पास होना मुश्किल हो जाता है।

उदाहरण के रूप में, यदि किसी लोकसभा चुनाव में 4 पार्टियां हिस्सा ले रही हैं, जिसमें से एक पार्टी को 40% वोट मिल रहे हैं और सीट के मामले में बहुमत का आंकड़ा पार कर लेती है तो वह सत्ता में आ जाती है।

लेकिन वो 60% लोग उनकी विचारधारा से सहमत नहीं रहते हैं, उनसे यदि किसी भी विधेयक को पास करने से पहले राय ली जाए तो वह अवश्य ही उनकी खिलाफत करेंगे। भारत में तो यह बहुत ही आम बात है और आप इसे भली-भांति समझते भी होंगे।

लोकतंत्र के प्रकार:

लोकतंत्र 2 प्रकार का होता है: पहला, प्रतिनिधि लोकतंत्र, जैसा कि भारत सहित दुनिया के कई सारे देशों में है। यानी कि इसमें कोई एक प्रतिनिधि चुन लिया जाता है और वही अपने अनुसार सभी फैसले लेता है। यदि वह फैसले जनता के हित में नहीं या उन्हें पसंद हैं तो भी मानना पड़ता है।

उदाहरण के रूप में, भारत में लोगों को वोट डालकर सांसद या विधायक चुनने का अधिकार मिलता है। लेकिन वह सांसद या विधायक मिलकर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को गद्दी पर बैठाते हैं। हालांकि, कुछ देशों में मिश्रित व्यवस्था भी है, जिसमें जनता को अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि चुनने के साथ ही साथ प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति चुनने के लिए भी वोटिंग करना होता है।

प्रतिनिधि लोकतंत्र को ही कई समाजशास्त्री छलावा मानते हैं, क्योंकि इसमें जनता को सिर्फ वोट डालने का ही अधिकार होता है। इसके अलावा वह किसी भी नीतिगत फैसले में हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं और ना ही अपनी राय लोगों के सामने रख सकते हैं। यदि सत्ता में बैठा व्यक्ति मनमानी करना चाहे और उसके पास बहुमत का आंकड़ा हो तो उसे रोकना मुश्किल होता है।

इसके अलावा, दूसरा होता है प्रत्यक्ष लोकतंत्र, जो कि विश्व में सिर्फ स्विट्ज़रलैंड देश में ही देखने को मिलता है। सैद्धांतिक रूप से बात की जाए तो इसमें प्रतिनिधि या कोई भी मध्यस्थ व्यक्त नहीं होता है। यानी किसी भी फैसले को लागू करने से पहले जनता से भी वोटिंग के जरिए राय ली जाती है।

इस प्रकार की लोकतांत्रिक प्रणाली जनता के अधिकार को और भी मजबूत बनाती है। इसका मतलब यह है कि ऐसे फैसले जिसे जनता अपने हित में नहीं मानती है वह लागू नहीं हो सकता है।

लोकतंत्र की कुछ परिभाषाएँ / Loktantra Ki Paribhasha:

लोकतंत्र को लेकर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की परिभाषा को सबसे अधिक प्रयोग में लाया जाता है। उनका मानना था कि लोकतंत्र का मतलब है, “जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन।” लेकिन कई सारे विद्वान इस परिभाषा से बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं, क्योंकि इसमें ‘जनता द्वारा शासन’ जैसा कुछ भी देखने को नहीं मिलता।

लोकतंत्र के संबंध में लिण्सेट की परिभाषा सबसे अधिक सटीक दिखती है। उनके अनुसार, “लोकतंत्र एक ऐसी राजनीतिक प्रणाली है जो पदाधिकारियों को बदल देने के नियमित सांविधानिक अवसर प्रदान करती है और एक ऐसे रचनातंत्र का प्रावधान करती है, जिसके तहत जनसंख्या का एक विशाल हिस्सा राजनीतिक प्रभार प्राप्त करने के इच्छुक प्रतियोगियों में से मनोनुकूल चयन कर महत्त्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित करती है।”

लोकतंत्र की अवधारणाएँ:

लोकतंत्र का पुरातन उदारवादी सिद्धान्त

इसमें स्वतन्त्रता, समानता, अधिकार, धर्म निरपेक्षता और न्याय जैसी अवधारणाओं के बारे में प्रमुखता से कहा गया है। सामंतवादी शक्तियों से स्वतंत्र होने की बाद शासन को संचालित करने में लिए इसे राजनीतिक प्रणाली में लागू किया गया। लोकतंत्र के बारे में शुरुआती बातें टॉमस मूर (यूटोपिया, 1616) और विंस्टैनले जैसे अंग्रेज विचारकों के साहित्य में मिलती हैं।

लोकतंत्र का अभिजनवादी सिद्धान्त:

अभिजन (Elite) शब्द का प्रयोग किसी समूह के ऐसे वर्ग के लोगों के लिए होता है, जिनकी किसी देश में एक अलग विशेष पहचान होती है, यानी वह एक अलग हैसियत रखते हैं। इस सिद्धांत का मुख्य आधार यह है कि समाज में 2 तरह के लोग होते हैं- गिने चुने विशेष लोग और बड़ा जनसमूह। अभिजन वर्ग सत्ता पर एकाधिकार कर लेता है और इससे जुड़े सारे लाभ उठाता है, जबकि अन्य लोग यानी बड़ा जनसमूह उनके द्वारा मनमाने ढंग से नियंत्रित और निर्देशित होता है।

लोकतंत्र का बहुलवादी सिद्धान्त:

बहुलवादी सिद्धान्त भी समूहों की भूमिका पर अधिक बल देता है। यह एक ऐसी प्रणाली पर जोर देता है जो उदारवादी लोकतंत्र में अभिजनवाद की प्रवृत्ति को निष्प्रभावी कर दे।

प्रतिभागी लोकतंत्र का सिद्धान्त:

प्रतिभागी लोकतंत्र का सिद्धांत खासकर पूंजीवादी लोकतंत्रों में अक्सर चुनावों में वोटिंग तक ही सीमित रहता है। इस सिद्धांत को बताने वाले लोगों के अनुसार यदि नीतिगत फैसले लेने का अधिकार सिर्फ अभिजन वर्ग को ही रहे तो उससे लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप बिगड़ जाता है। इसलिए वे लोकतंत्र में आम आदमी को भी भाग लेने पर जोर देते हैं।

प्रतिभागी लोकतंत्र की वकालत करने वाले लोगों का मानना है कि यदि लोकतांत्रिक अधिकार सिर्फ संविधान की पुस्तक तक ही सीमित रहे तो फिर उनका कोई अर्थ नहीं है। इसीलिए, आम लोगों को भी उन अधिकारों का इस्तेमाल करना आवश्यक है। लेकिन यह तभी संभव है, जब व्यक्ति के पास स्वतंत्रता और समानता का अधिकार हो।

लोकतंत्र का मार्क्सवादी सिद्धान्त:

लोकतंत्र के मार्क्सवादी सिद्धान्त को जनता का लोकतंत्र या समाजवादी लोकतंत्र भी कहा जाता है। क्योंकि इस सिद्धांत में जनता को अधिक शक्तियाँ देने पर जोर दिया गया है। इस सिद्धांत में यह कहा गया है कि पूंजीवादी व्यवस्था में लोकतांत्रिक अधिकार आम जनता के पास न होकर सिर्फ अमीर वर्ग के हाथ में होता है, इसलिए ऐसे लोकतंत्र की स्थापना करना आवश्यक है जो जनता का हो।

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