Jallianwala Bagh Hatyakand: जलियांवाला बाग हत्याकांड कब और कहां हुआ था

जलियांवाला बाग हत्याकांड कब और कहां हुआ था | जलियांवाला हत्याकांड कब हुआ था | जलियांवाला बाग हत्याकांड कब हुआ था

आप सभी ने इतिहास में जलियांवाला बाग हत्याकांड (Jallianwala Bagh Hatyakand) के बारे में अवश्य ही सुना होगा। भारतीय इतिहास में अलग-अलग शासकों द्वारा कई बार नरसंहार किए गए हैं, जलियांवाला बाग हत्याकांड भी इनमें से एक है। रौलट एक्ट का विरोध करने के चलते अंग्रेज अधिकारी जनरल डायर ने सभा में उपस्थित भीड़ पर गोलियां चलाना शुरू कर दिया था जिसमें लगभग 400 लोग मारे गए थे और अनगिनत लोग घायल हुए थे।

जनरल डायर के इस कृत्य की पूरे विश्व में काफी आलोचना की गई और इस घटना ने भारतीयों को और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष कर रहे क्रांतिकारियों को काफी आहत किया। इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि जलियांवाला बाग हत्याकांड कब और कहां हुआ था? इसके साथ ही साथ हम आपको इसके बारे में सभी प्रकार की जरूरी जानकारी देंगे।

हालांकि जलियांवाला बाग हत्याकांड को भारतीय स्वतंत्रता इतिहास की सबसे क्रूर घटना मानी जाती है क्योंकि इससे पहले या इसके बाद अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर जितने भी जुल्म किए गए थे, वह सभी भारतीयों के उग्र प्रदर्शन या अंग्रेज़ अधिकारी की अवहेलना करने के जवाब में ही किए गए थे। यह इतिहास की पहली ऐसी घटना थी जब शांतिपूर्ण सभा पर किसी अंग्रेज अधिकारी द्वारा भीड़ पर गोलियां चलवाने का आदेश दिया गया था। इसके साथ ही साथ इस घटना के जिम्मेदार जनरल रेजीनाल्ड डायर द्वारा हंटर कमीशन के सामने यह कबूल भी किया गया था कि वह यहां पर सभा में उपस्थित लोगों पर गोलियां बरसाने के उद्देश्य से ही वहां पहुंचा था। इतना ही नहीं वह 2 तोपें भी लेकर गया था ताकि उन्हें आसानी से मारा जा सके। लेकिन संकरी गली होने के चलते तोपें वहां तक नहीं पहुंच सकीं।

जलियांवाला बाग हत्याकांड क्या है? / Jallianwala Bagh Hatyakand

प्रथम विश्व युद्ध में भारतीयों ने अंग्रेजों का साथ दिया था। इस विश्व युद्ध में करीब 13 लाख भारतीय सैनिकों को यूरोप अफ्रीका और मिडिल ईस्ट में तैनात किया गया था। जब भारतीयों ने प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजी सेना का साथ दिया तो यह उम्मीद जताई जा रही थी कि अंग्रेज सरकार उनके साथ नरमी बरते की लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अंग्रेजों उन्होंने रोलेट एक्ट लागू करके सभी आंदोलनकारियों को अपना आंदोलन बंद करने के लिए कहा। रोलेट एक्ट के अनुसार अंग्रेज सरकार को प्रेस पर सेंसरशिप लगाने, नेताओं को बिना मुकदमें के जेल में रखने, लोगों को बिना वॉरण्ट के गिरफ़्तार करने, उन पर विशेष ट्रिब्यूनलों और बंद कमरों में बिना जवाबदेही दिए हुए मुकदमा चलाने जैसे कई सारे अधिकार मिले थे।

पूरे देश भर में रोलेट एक्ट का जमकर विरोध किया गया और बहुत सारे लोगों ने अपने गिरफ्तारियां भी दी। महात्मा गांधी ने भी इस एक्ट का विरोध करने के लिए पूरी जनता को आह्वान किया था। इसी बीच 2 क्रांतिकारी नेताओं सत्यपाल और सैफ़ुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर कालापानी की सजा सुना दी गई थी। इसके विरोध में 10 अप्रैल 1919 को अंग्रेज पुलिस कमिश्नर के घर का घेराव किया गया। लेकिन शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे भारतीयों पर पुलिस ने गोलियां बरसाना शुरू कर दिया। इस गोलीबारी से क्रोधित होकर भारतीयों ने अलग-अलग जगहों पर आगजनी करना शुरू कर दिया था जिसमें 5 यूरोपीय व्यक्तियों की मृत्यु हो गई थी।

पुलिस ने भी भारतीयों पर जहां-तहां गोलियां बरसाना शुरू कर दिया था जिसमें लगभग 20 लोगों की मृत्यु हुई थी। हालांकि अगले 2 दिन तक इसी के चलते शांति बनी रही और 13 अप्रैल 1919 को यानी बैशाखी के दिन जलियांवाला बाग में एक सभा रखी गई। उस समय पूरे शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था लेकिन वैशाखी का दिन होने के चलते बहुत सारे लोग मेला देखने के लिए अपने घरों से बाहर निकले हुए थे। इस सभा के बारे में जानकर कई लोग वहां पहुंचे थे।

जब इस सभा में नेता भाषण दे रहे थे तब अंग्रेज जनरल रेजीनाल्ड डायर लगभग 90 सैनिकों के साथ जलियांवाला बाग सभागार में पहुंच गया। उसे देखकर भारतीयों ने विरोध करना शुरू किया लेकिन सभा में उपस्थित नेताओं ने सभी को शांत रहने की अपील की। हालांकि जनरल डायर को भारतीयों का यह विरोध पसंद नहीं आया और उसने बदला लेने के उद्देश्य से ताबड़तोड़ गोलियां बरसाने का आदेश दे दिया। इस गोलीबारी में लगभग 484 लोग मारे गए थे, जिसका रिकॉर्ड अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर के ऑफिस में मौजूद है।

हालांकि जलियांवाला बाग में 388 ज्ञात शहीदों की सूची दी गई है। हालांकि अलग-अलग रिकॉर्ड्स में शहीदों की संख्या एवं घायलों की संख्या अलग-अलग बताई गई है। पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार इस हत्याकांड में 1200 से भी अधिक लोग मारे गए थे, जबकि आधिकारिक रिपोर्ट कुछ और ही बताती है। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बारे में सुनकर भगत सिंह भी काफी आहत हुए थे और वह इस घटना के बारे में सुनते ही दौड़ते हुए यहां पहुंचे थे। आपको बता दें कि उस समय उनकी उम्र मात्र 12 वर्ष थी और वह स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जलियांवाला बाग कई सारे घरों के पीछे एक खाली मैदान हुआ करता था जिस से बाहर निकलने के लिए सिर्फ एक सकरी गली थी। इसी बाग में एक कुआं भी था। जब अंग्रेज सैनिकों ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरू की तो कई लोग अपनी जान बचाने के लिए इस कुएं में भी कूद गए। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार इस कुएं में कूदने से 120 लोग शहीद हुए थे। आज के समय में इस कुएं को शहीदी कुआं के नाम से जाना जाता है।

जनरल रेजीनाल्ड डायर द्वारा कराए गए इस कुकृत्य के बाद ब्रिटिश लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल माईकल ओ’ डायर ने उसकी सराहना भी की थी। इसके बाद माइकल ओ डायर की मांग पर  तत्कालीन वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने अमृतसर में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। जलियांवाला बाग हत्याकांड की पूरे विश्व भर में निंदा की गई जिसके चलते भारत के सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट एडविन मॉण्टेगू ने 1919 के अंत में इस हत्याकांड की जांच करने के लिए हंटर कमीशन नियुक्त किया। हंटर कमीशन के सामने जनरल डायर ने जो कबूल किया कि वह पहले से ही गोलियां बरसाने और उन्हें जान से मारने के इरादे से गया था।

हंटर कमीशन की रिपोर्ट पर 1920 में उसे जनरल के पद से हटाकर कर्नल बना दिया गया और बाद में स्वास्थ्य समस्याओं के चलते उसे ब्रिटेन भेज दिया गया। इस हत्याकांड के जिम्मेदार जनरल डायर के लिए हाउस ऑफ़ कॉमन्स ने उसका निंदा प्रस्ताव पारित किया, लेकिन हाउस ऑफ़ लॉर्ड ने उसका प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया। लेकिन विश्व भर में इस हत्याकांड की निंदा होने के चलते ब्रिटिश सरकार को निंदा प्रस्ताव पारित करना पड़ा जिसके फलस्वरूप 1920 में ब्रिगेडियर जनरल डायर को इस्तीफा सौंपना पड़ा। 1927 में ब्रिगेडियर जनरल डायर की मृत्यु हो गई।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के पतन का आरंभ शुरू हो गया। क्योंकि इस हत्याकांड से भारतीयों के मन में ब्रिटिश साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकने की कड़ी मंशा बनी। इसी हत्याकांड से सरदार भगत सिंह पर भी गहरा प्रभाव पड़ा था और उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकने की कसम खाई थी।

जलियांवाला बाग हत्याकांड कब हुआ था / Jallianwala bagh hatyakand kab hua tha ?

जलियांवाला बाग हत्याकांड 13 अप्रैल 1919 को हुआ था। सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी पर हो रहे विरोध प्रदर्शन के चलते पूरे शहर में कर्फ्यू लगाया गया था। 13 अप्रैल को बैसाखी का त्यौहार मनाया जा रहा था और बहुत सारे लोग मेला देखने के लिए बाहर निकले थे। इस दिन जलियांवाला बाग में एक सभा आयोजित की गई थी। अंग्रेज सैनिकों ने सभा में उपस्थित भीड़ पर गोलियां चलाई थी।

जलियांवाला बाग हत्याकांड कहां हुआ था?

जलियांवाला बाग हत्याकांड अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुआ था। इस घटना में लगभग 500 लोग मारे गए थे। जनरल रेजीनाल्ड डायर के कहने पर 90 अंग्रेज सैनिकों ने लगभग 10 मिनट तक 1500 राउंड फायरिंग की थी। कई लोग अपनी जान बचाने के लिए पास के कुएं में कूद गए थे, जिसमें लगभग 120 लोगों की लाशें मिली थी।

जनरल डायर कौन था?

जलियांवाला बाग में सभा में उपस्थित भीड़ पर गोलियां चलाने का आदेश जनरल डायर ने ही दिया था। जनरल डायर का पूरा नाम जनरल रेजीनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर था। जब भारत में रौलट एक्ट लागू किया गया तो भारतीयों द्वारा इसका जमकर विरोध किया गया। इसी को देखते हुए ब्रिटिश सेना के अधिकारी कर्नल रेजीनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर को पंजाब का अस्थाई ब्रिगेडियर जनरल बना दिया गया था। हंटर कमीशन की रिपोर्ट के बाद जनरल डायर को उसके पद से हटाकर फिर से कर्नल बना दिया गया लेकिन उसे कहीं भी नियुक्त नहीं किया गया।

इस हत्याकांड का पूरे विश्व भर में और खासकर कि भारत में इसका उग्र विरोध होने के चलते रेजीनाल्ड डायर को भारत में नियुक्त न करने का फैसला लिया गया और बाद में उसे इंग्लैंड भेज दिया गया। हालांकि उसके इस कृत्य का ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा काफी सराहना की गई और इसीलिए हाउस ऑफ लॉर्ड ने प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया, हालांकि  हाउस ऑफ कॉमंस ने निंदा प्रस्ताव पारित किया था। लेकिन वैश्विक विरोध के चलते अंग्रेज सरकार को निंदा प्रस्ताव पारित करना पड़ा।

जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए सरदार उधम सिंह (Sardar Udham Singh) का बदला:

जलियांवाला बाग हत्याकांड के दौरान सरदार उधम सिंह भी इस सभा में मौजूद थे। सरदार उधम सिंह इस क्रूर घटना से काफी आहत हुए और उन्होंने इसका बदला लेने का प्रण किया। बदला लेने के उद्देश्य वह अलग-अलग जगहों से होते हुए लंदन पहुंचे। उन्होंने लंदन में कई दिनों तक अपना नाम बदलकर अलग-अलग काम किए लेकिन उन्हें कभी ऐसा मौका नहीं मिला कि वह जनरल रेजीनाल्ड डायर से इसका बदला ले सकें।

1927 में जनरल रेजीनाल्ड डायर की मृत्यु के बाद भी उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड की प्रशंसा करने वाले डिप्टी गवर्नर जनरल माइकल ओ’ डायर की हत्या करके पूरे विश्व में यह संदेश देना चाहा कि भारतीय किसी से कमजोर नहीं हैं और वह अपने हक के लिए कुछ भी कर सकते हैं। इसके साथ ही साथ उनकी यह सोच थी कि माइकल ओ डायर की हत्या करके वह अंग्रेज सरकार को भारत छोड़ने के लिए मजबूर करेंगे।

कई दिनों तक लंदन में अलग अलग नाम से रहने वाले सरदार उधम सिंह को एक मौका मिला जब 13 मार्च 1940 को लंदन के कैप्टन हॉल में ब्रिटिश लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’ डायर एक सभा में उपस्थित हुआ था। सरदार उधम सिंह भी अपना भेस बदल कर इस सभा में पहुंचे थे। हालांकि सुरक्षा के कड़े इंतजाम होने के बावजूद भी वह एक पिस्तौल किताब में छुपाकर पहुंचे थे। हॉल में पहुंचने के बाद जैसे ही उन्होंने माइकल ओ डायर को देखा वैसे ही उन्होंने उस पर गोली चला दी।

गोली चलाने के बाद उन्होंने अंग्रेजों के सामने सरेंडर भी कर दिया ताकि वह पूरी दुनिया को दिखा सके कि उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने के उद्देश्य से यह कृत्य किया है। इसके साथ ही साथ पूरे विश्व में भी इस बात पर चर्चा हुई। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने सरदार उधम सिंह के इस हत्या की कड़ी निंदा भी की और पूरे विश्व के सामने या विचार रखा की भारत उनके द्वारा की गई इस हत्या के साथ नहीं है। हालांकि माइकल ओ डायर की हत्या के जुर्म में उधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को फांसी दे दी गई।

जलियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक:

जलियांवाला बाग हत्याकांड के अगले ही साल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित करके यहां पर शहीद स्मारक बनाने के लिए ट्रस्ट की स्थापना की। इस ट्रस्ट द्वारा 1923 में इसके लिए जमीन खरीदी गई। इस स्मारक को डिजाइन करने का काम अमेरिकी वास्तुकार बेंजामिन पोल्क द्वारा किया गया था। हालांकि 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा इस स्मारक का उद्घाटन किया गया। 2019 से लेकर 2021 तक इसमें अन्य निर्माण कार्य कराया गया। फल स्वरुप 2021 में यहां पर एक नया स्मारक बनकर तैयार हुआ जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र को समर्पित किया गया।

1997 में जब ब्रिटेन की महारानी ने भारत का दौरा किया था तब वह जलियांवाला बाग में बने स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि भी दी थी। इतना ही नहीं जब 2013 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन भारत दौरे पर आए थे तो वह भी इस स्मारक को देखने पहुंचे थे। इतना ही नहीं उन्होंने इतिहास में हुई इस दुर्घटना की कड़ी निंदा भी की थी। क्योंकि उन्होंने अपने विजिटर्स बुक में लिखा था कि “यह ब्रिटिश इतिहास की यह एक शर्मनाक घटना थी।”

निष्कर्ष:

उम्मीद है इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद आप जलियांवाला बाग हत्याकांड के बारे में जानने के साथ-साथ उस हत्याकांड का बदला लेने वाले सरदार उधम सिंह के बारे में भी जान गए होंगे। इस जानकारी को अपने दोस्तों एवं करीबियों के साथ शेयर जरूर करें। इसी तरह के ऐतिहासिक जानकारियों को पढ़ने के लिए हमारे वेबसाइट को बुकमार्क अवश्य करें।

 

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