शीत युद्ध क्या है? शीत युद्ध के कारण | शीत युद्ध का दौर

शीत युद्ध क्या है | शीत युद्ध के कारण | शीत युद्ध का दौर | Cold War in Hindi | शीत युद्ध से क्या तात्पर्य है

जब आप कभी आधुनिक विश्व का इतिहास पढ़ते होंगे तो उसमें शीत युद्ध (Cold War) के बारे में भी वर्णन मिलता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के समय में विश्व की दो सबसे बड़ी महाशक्तियों संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ रूस के बीच तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी। इसे ही शीत युद्ध के नाम से जाना जाता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शीत युद्ध में हथियारों से कोई लड़ाई नहीं लड़ी जाती है, बल्कि एक दूसरे देशों के बीच धमकियों का सिलसिला चलते रहता है। इतना ही नहीं शीत युद्ध में देश एक दूसरे के खिलाफ रणनीतियां बनाकर उसे कमजोर करने की कोशिश करते हैं।

शीत युद्ध क्या है?

संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव की स्थिति को शीत युद्ध के नाम से जाना जाता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शीत युद्ध में हथियारों से लड़ाई नहीं लड़ी जाती है बल्कि एक देश दूसरे देश को धमकियां देते हैं और उनके विरुद्ध कई प्रकार के प्रतिबंध भी लगाते हैं। शीत युद्ध में दो या दो से अधिक देशों के बीच वैचारिक मतभेद हो सकते हैं जिसके तहत कूटनीति और अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए कार्य किए जा सकते हैं।

इस युद्ध में दोनों देश अपने आप को विश्व में सबसे बड़ी महाशक्ति बताने के लिए एक दूसरे के विरुद्ध कई कूटनीतिक उपाय अपनाए। इस कूटनीति के तहत कई सारे राष्ट्रों के साथ अच्छे संबंध बनाकर उन्हें अपनी और भी मिलाया गया, ताकि अपने प्रतिद्वंदी को अपनी शक्ति का बोध कराया जा सके। आज भी दोनों देश एक दूसरे के कट्टर प्रतिद्वंदी माने जाते हैं और अलग-अलग देशों से मित्रवत संबंध बनाकर समय-समय पर अपने महाशक्ति होने का बोध भी कराते हैं। इसीलिए विश्व में संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस को दो सबसे बड़ी महाशक्तियां कहा जाता है।

जैसा कि हमने आपको ऊपर ही बताया द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ रूस के बीच तनाव की स्थिति को शीत युद्ध के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध में यूएसए ब्रिटेन और रूस ने एक साथ मिलकर लड़ाई लड़ी थी। लेकिन इसके बाद यूएसए और सोवियत संघ में अलग अलग कारणों से मतभेद शुरू हो गए। धीरे-धीरे यह मतभेद बढ़ता गया और तनाव की स्थिति पैदा हो गई। आपको बता दें कि वर्तमान समय में भी विश्व की ये दो महाशक्तियां एक दूसरे की कट्टर प्रतिद्वंदी हैं।

साम्यवादी देश रूस के नेतृत्व में और पूंजीवादी देश अमेरिका के नेतृत्व में अलग-अलग हिस्सों में बंट गए। हालांकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कभी भी संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस के बीच युद्ध नहीं हुआ लेकिन दोनों गुटों ने हमेशा ऐसा वातावरण बनाए रखा की युद्ध का हमेशा से ही माहौल दिखाई देता था। इस बीच बर्लिन संकट, कोरिया युद्ध, सोवियत रूस द्वारा एटॉमिक परीक्षण, सैनिक संगठन, भारत-चीन युद्ध, U-2 विमान काण्ड, क्यूबा मिसाइल संकट, जैसी कुछ परिस्थितियों ने युद्ध का माहौल पैदा कर दिया।

1991 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो इससे रूस की शक्ति काफी कम हो गई और इसके चलते उसे अपने कदम पीछे हटाने पड़े और इस तरह से शीत युद्ध भी समाप्त हो गया। हालांकि वर्तमान समय में संयुक्त राज्य अमेरिका ने रूस पर और रूस ने संयुक्त राज्य अमेरिका पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगाए हुए हैं। समय-समय पर दोनों में तनाव की स्थिति भी दिखाई देती है। हाल ही में जब सोवियत संघ का पूर्व सदस्य और रूस का पड़ोसी देश यूक्रेन NATO में शामिल होने जा रहा था, तो रूस ने इसका विरोध करने के उद्देश्य से यूक्रेन पर दबाव बनाने के लिए उसके सीमाओं को चारों तरफ से घेर लिया है। इस तरह से एक बार फिर रूस और NATO में शामिल देशों के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि NATO संयुक्त राज्य अमेरिका सहित 30 यूरोपीय देशों का सैन्य संगठन है। इस संगठन का उद्देश्य अपने सदस्यों को युद्ध की स्थिति में या किसी भी विवाद की स्थिति में सैन्य मदद देना है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने यूक्रेन की मदद करने के लिए अपने कुछ सैनिक भी भेजे हुए हैं। हालांकि रूस इसलिए यूक्रेन का नाटो में शामिल होने का विरोध कर रहा है क्योंकि यदि यूक्रेन NATO का सदस्य बनता है तो रूस पर संकट के बादल छा जाएंगे और अमेरिका जब चाहे तब उसे बर्बाद कर सकता है। हालांकि अब तक NATO और रूस में शीत युद्ध ही चल रहा है लेकिन तनाव की स्थिति को देखते हुए युद्ध का खतरा भी दिखाई दे रहा है।

शीत युद्ध से क्या तात्पर्य है?

शीत युद्ध का तात्पर्य वाक युद्ध से है, जिसमें दो देश अपने आप को बड़ा साबित करने के लिए कूटनीतिक उपाय अपनाती हैं और इसके लिए वह पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टीवी, इत्यादि प्रचार के साधनों का भी सहारा लेती हैं। अलग-अलग देशों के बीच अलग-अलग प्रकार के विवादों को भी शीत युद्ध की संज्ञा दी जाती है। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हुए तनाव को शीत युद्ध कहा जाता है। लेकिन 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद शीत युद्ध खुद-ब-खुद समाप्त हो गया।

शीत युद्ध का विकास:

प्रथम विश्व युद्ध के समय यानी 1917 में ही संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच कई प्रकार के मतभेद दिखाई देने लगे थे। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध में दोनों देश अपने अपने स्वार्थों के के लिए एक दूसरे का सहयोग कर रहे थे। द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद दोनों देशों ने एक दूसरे के विरुद्ध शिकायतें करनी शुरू कर दी। दोनों देशों के बीच अविश्वास की भावना शीत युद्ध का सबसे बड़ा कारण बनी।

शुरुआत में यह दोनों देश अलग-अलग नियमों एवं समझौतों के उल्लंघन के लिए दबी जबान में एक दूसरे का विरोध करते थे लेकिन कुछ ही दिनों में वे एक दूसरे का खुलकर विरोध करने लगे। इसके चलते पूरे विश्व में भय और अशांति का वातावरण शुरू हो गया क्योंकि एक दूसरे का खुलकर इतना विरोध करना एक नए विश्वयुद्ध के शुरू होने का संकेत था। हालांकि दोनों देशों के बीच जुबानी जंग चलती रही, जो आज भी चल रही है।

सोवियत संघ ने साम्यवादी सिद्धांत को मारने वाले देशों को अपनी तरफ जोड़ना शुरू कर दिया, जबकि अमेरिका ने पूंजीवाद के सिद्धांतों को मानने वाले देशों को अपने गुट में शामिल कर लिया। सोवियत संघ ने इसी बीच यूनान में भी साम्य बाद सिद्धांत का प्रचार प्रसार करना शुरू कर दिया था जिसके चलते पूंजीवादी सिद्धांतों पर चलने वाले देशों में विरोध की भावना और भी अधिक प्रबल हुई। अलग-अलग सिद्धांतों को मानने वाले दोनों देशों के बीच मतभेद होना तो निश्चित ही था।

बड़ा देश होने के चलते सोवियत संघ शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभर कर सामने आ रहा था जो अमेरिका को बिल्कुल भी रास नहीं आया। इसके साथ ही साथ सोवियत संघ ने याल्टा समझौते का उल्लंघन किया और फिर ईरान एवं तुर्की में भी हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया।  इतना ही नहीं सोवियत संघ ने बाल्कान समझौते का उल्लंघन करके अमेरिका और उसके गुट में शामिल देशों को और भी अधिक क्रोधित कर दिया।

इसी बीच अमेरिका ने अपनी शक्ति को बढ़ाने के लिए परमाणु कार्यक्रम शुरू कर दिया, जिसका सोवियत संघ ने जमकर विरोध किया। संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी भी प्रस्ताव को पारित करने एवं किसी के प्रस्ताव को रोकने के लिए सोवियत संघ बार बार वीटो पावर का इस्तेमाल कर रहा था जो किसी को भी रास नहीं आता था। इसी तरह से शीत युद्ध का विकास हो रहा था जिसका अंत सोवियत संघ के विघटन के बाद ही हुआ।

शीत युद्ध के विकास को मुख्यतः 4 चरणों में बांटा जाता है, जिसे 1946 से लेकर 1989 की अवधि तक माना जाता है। शीत युद्ध के विकास का पहला चरण 1946 से 1953 तक, दूसरा चरण 1953 से 1963, तीसरा चरण 1963 से 1979, अन्तिम और चौथा चरण 1980 से 1989 तक की अवधि तक माना जाता है।

शीत युद्ध के कारण:

द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका ब्रिटेन और रूस ने एक साथ मिलकर युद्ध लड़ा लेकिन अमेरिका और रूस अपने अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर यह युद्ध लड़ रही थी। दोनों देशों के बीच प्रथम विश्व युद्ध के बाद से ही आंशिक रूप से मतभेद थे लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह अधिक तेजी से उभर कर सामने आया और दोनों के बीच मतभेद ने तनाव का रूप ले लिया और शीत युद्ध छेड़ दिया। शीत युद्ध के कई प्रमुख कारण थे, जो निम्नलिखित हैं:

  • अमेरिका द्वारा पूंजीवादी और रूस द्वारा साम्यवादी विचारधारा का प्रसार करना
  • सोवियत संघ द्वारा याल्टा समझौते का उल्लंघन करना
  • दोनों देशों में वैचारिक मतभेद का होना
  • सोवियत संघ का शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभर कर सामने आना
  • ईरान और तर्की में सोवियत संघ का हस्तक्षेप करना
  • यूनान में साम्यवादी सिद्धांतों को बढ़ावा देना
  • सोवियत संघ द्वारा बाल्कान समझौते का उल्लंघन करना
  • अमेरिका द्वारा चलाए जा रहे परमाणु कार्यक्रम
  • एक दूसरे के विरुद्ध प्रचार प्रसार करना
  • लैंड-लीज समझौते का समाप्त होना
  • अमेरिकी द्वारा फासीवादी ताकतों को बढ़ावा एवं सहयोग देना
  • बर्लिन विवाद
  • सोवियत संघ द्वारा बार बार वीटो पॉवर का प्रयोग

इनके अलावा कुछ ऐसे भी छोटे-छोटे कारण थे, जिसके चलते शीत युद्ध की शुरुआत हुई थी। 25 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ के विघटन के बाद कई सारे छोटे छोटे देश अलग हो गए और इसके चलते रूस की सैन्य स्थिति कमजोर पड़ गई। तत्कालीन राष्ट्रपति Mikhail Gorbachev के इस्तीफा देने के बाद शीत युद्ध खुद-ब-खुद समाप्त हो गया। हालांकि अब भी संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस के बीच मतभेद होता रहता है।

 

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